Wednesday, 9 April, 2008

कैसे गिनें प्रति शेयर आय How to calculate Earning Per Share (EPS)

Earning Per Share (EPS) यानि प्रति शेयर आय कैसे गिनी जाती है और इससे कंपनी की आर्थिक सेहत को कैसे जाना जाता है, आज इसके बारे में विचार करते हैं।

 

कंपनी की कुल शुद्ध लाभ से हर शेयर के हिस्से में कितनी रकम आयेगी उसे ही प्रति शेयर आय कहते हैं। यानि इसे गिनेंगे

 

शुद्ध लाभ / कुल शेयरों की संख्या

 

यदि 10 करोड़ रु की पूंजी वाली कंपनी जिसके 10 रु की कीमत वाले 1 करोड़ शेयर हों और वह कंपनी 20 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाती है तो उसकी प्रति शेयर आय 20 रुपये होगी:

 

20 करोड़ / 1 करोड़ = 20

 

यदि कोई कंपनी केवल तिमाही नतीजे  ही घोषित करती है तो उन नतीजों के आधार पर कंपनी के पूरे साल के प्रति शेयर आय की भी गणना की जा सकती है।

उपरोक्त उदाहरण में यदि कंपनी आने वाली तिमाही के लिये 6 करोड़ रु का शुद्ध लाभ घोषित करती है तो हम अंदाज लगा सकते हैं कि कंपनी की प्रति शेयर आय आने वाले साल में बढ़ कर 24 रु हो जायेगी। इसी प्रकार अर्धवार्षिक परिणामों को देख कर भी वार्षिक प्रति शेयर आय की भी गणना की जा सकती है।

 

इस बात का ध्यान रहे कि यदि कंपनी तेजी से विकास कर रही है या कंपनी का सीजनल काम है जो कि पूरे वर्ष एक सा नहीं रहता तो तिमाही नतीजों से वार्षिक प्रति शेयर आय की भविष्यवाणी गलत भी साबित हो सकती है।

एक बात और भी घ्यान देने लायक है कि यदि कंपनी ने वर्तमान तिमाही में कोई ऐसी बड़ी डील की है जिसके दोहराव की संभावना नहीं है तो उस डील से हुए लाभ या हानि समायोजित करके ही वार्षिक आय की गणना की जानी चाहिये।

 

ज्यादातर शेयरों की कीमतें चालू अथवा आने वाले साल के प्रति शेयर आय की संभावनाओं पर निर्भर करतीं हैं।

कोई भी शेयर बाजार में सस्ता है या मंहगा अथवा किसी शेयर की कीमतों में कितनी बढ़ौतरी की संभावनायें हैं इसे जानने का बहुत बड़ा मानक है प्रति शेयर आय EPS और प्रति शेयर कीमत अनुपात यानि P/E Ratio. इसके बारे में अगली बार।

 

 

 

Saturday, 10 November, 2007

निवेश में धोखे से कैसे बचें

आज आपको कुछ साधारण किस्म के धोखों से बचने के उपायों के बारे में बताते हैं जो कि अक्सर आपके एजेंट कर जाते हैं।

मेरे एक मित्र ने निवेश तो किया था म्यूचल फंड में मगर एजेंट ने उन्हें यूलिप बेच दिया। कई बार ऐसा होता है कि एजेंट सपने तो किसी और प्लान या प्रोडक्ट के दिखाते हैं मगर जब वास्तव में आपके पास निवेश के कागज पहुंचते हैं तो उसमें कुछ और ही निकलता है। कई निवेशक तो आलस के कारण या जानकारी न होने के कारण प्राप्त कागजों को देखते भी नहीं कि उन्हें जो निवेश के कागजात मिले हैं उनमें सब कुछ सही है कि नहीं।

आपको हमने पहले भी इस बात के लिये आगाह किया था कि कैसे कुछ एजेंट बड़े बड़े वादे करके कुछ भी बेच देते हैं। यह भी बताया था कि किस तरह से अपने एजेंट का चुनाव करें। इसके बाद जब आप कोई निवेश करते हैं निवेश के कगज प्राप्त होने के बाद क्या करना है आज हम आपको वही बताना चाहते हैं:

1. जिस स्कीम में निवेश किया था क्या यह वही है: बहुत जरूरी है यह जांचना कि आपने जिस स्कीम में देखभाल कर और अपनी जरूरत के हिसाब से निवेश किया था क्या प्राप्त कागजात उसी स्कीम में निवेश हुए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि एजेंट ने अपनी कमीशन के चक्कर में आपको कोई ऐसा प्लान दे दिया हो जो आपकी जरूरतों के मुताबिक ही न हो। यहां म्यूचल फंड और यूलिप (ULIP) में अंतर को समझना भी जरूरी है। म्यूचल फंड मध्यम समय (पांच से सात वर्ष) के लिये निवेश के लिये उत्तम हैं और यूलिप दस साल या उससे अधिक समय के लिये। यूलिप में पहले वर्ष में ज्यादा चार्जेस कटते हैं मगर लम्बी अवधी में यूलिप म्यूचल फंड से भी ज्यादा फायदेमंद साबित होता है।

2. बाकी जानकारी भी देखें : अच्छी तरह से देख लें कि आपका नाम, आपका पता, जन्म की तारीख, संपर्क नंबर, नामित व्यक्ति (nominee) का नाम जैसी जरूरी जानकारी सही से भरी है कि नहीं। याद रखें कि यदि आपने कभी कोई बीमा या यूलिप लिया है और इनमें से कोई जानकारी सही नहीं है तो क्लेम लेने में कई तरह की दिक्कतें भी आ सकती हैं। कुछ कंपनियां आपके द्वारा भेजे गये फार्म की कापी भी करवा कर आपको भेजतीं हैं उसे भी अच्छी तरह जांच लें कि आपके फार्म भरने के बद एजेंट ने उस में कोई बदलाव तो नहीं किये हैं।

3. प्लान के नियम व शर्तें: बहुत लंबी, उबाउ और कानूनी भाषा मे लिखे यह नियम व शर्तें जरूर पढ़ें। कुछ समझ न आये तो किसी जानकार से उसके बारे में जानने से परहेज न करें। अधिकतर कंपनियां कस्टमर्स केयर नंबर भी देतीं हैं वहां संपर्क करें या स्वंय कंपनी के कार्यालय/शाखा में जायें।

4. शुल्क तथा प्रभार: यह भी देख लें कि जैसा बताया गया था क्या शुल्क तथा प्रभार वैसे ही लगे हैं या ज्यादा लगे हैं। भविष्य में लगने वाले प्रभारों की भी जानकारी लें।

इस सब को देखने के बाद और सब कुछ सही पाने के बाद अपने कागजों को संभाल कर रखें। हो सके तो किसी प्लास्टिक की फाइल या फोल्डर में ही रखें। लकड़ी की अलमारी के बजाये लोहे की अलमारी में रखना ज्यादा सुरक्षित है। जहां भी रखें अपने घर के जिम्मेदार व्यक्तियों को अवश्य बतायें। अपने एजेंट का विजिटिंग कार्ड अपने निवेश के कागजों के साथ रखें जिससे कि समय असमय संपर्क करने में आसानी रहे।

अगली बार आपको बतायेंगे कि यदि आपको एजेंट आपको धोखा दे जाये तो उससे कैसे निबटें।

Friday, 9 November, 2007

पूंजी बाजार अब ब्लॉगस्पॉट पर

शेयर बाजार और निवेश संबंधी जानकारी का मेरा चिट्ठा ’पूंजी बाजार’ अब वर्डप्रैस से ब्लॉगस्पॉट पर आ गया है। नया पता है

http://poonji.blogspot.com/

पुराने लेख वर्डप्रैस पर भी उपलब्ध रहेंगे। अभी पुराने पोस्टों से टिप्पणियां स्थानांतरित नहीं हुई हैं। इन्हे धीरे धीरे नये चिट्ठे पर लाया जायेगा।

तो अब आपसे नये चिट्ठे पर पहले से ज्यादा और जल्दी जल्दी मुलाकात होती रहेगी।

Saturday, 18 August, 2007

सेंसैक्स में शामिल शेयर

आज दिवाकर प्रताप सिंह ने पूछा:

 मुम्बई स्टाक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक जिसे संक्षेप में सेंसैक्स कहा जाता है, जो वहां के सर्वोच्च 30 शेयरों पर आधारित है। उन 30 शेयरों के नाम क्या है ?

तो यह है सैंसेक्स में शामिल शेयरों की सूची:

१. ए सी सी

२. बजाज आटो

३ . भारती टेलिवेंचर

४. भेल

५. सिप्ला लिमिटेड

६. डाक्टर रेडी लैब

७. ग्रासिम लिमिटेड

८. गुजरात अंबुजा सीमेंट

९. एच डी एफ सी

१०. एच डी एफ सी बैंक

११. हिंडेलको

१२. हिंदुस्तान लिवर

१३.आइसीआइसीआइ बैंक

१४. इन्फोसिस टैक्नोलोजी

१५. आईटीसी लिमिटेड

१६. लार्सन एंड टुर्बो

१७. महिंद्रा एंड महिंद्रा

१८. मारुति उद्योग

१९. नैशनल थर्मल पावर

२०. ओएनजीसी

२१. रैन्बैक्सी लैब

२२. रिलांयस

२३. रिलांयस काम्युनिकेशन्स

२४. रिलांयस एनेर्जी

२५. सत्यम कंप्यूटर्स

२६. स्टेट बैंक आफ इंडिया

२७. टाटा कंसलटैंसी

२८. टाटा मोटर्स

२९. टाटा स्टील

३०. विप्रो

स्रोत बीएसई

यहां आपको यह बता दें कि यह सूची समय समय पर बदलती रहती है तथा बीएसई आवश्यक्ता के अनुसार इस सूची में बदलाव करता रह्ता है मगर सूचकांक में कुल शेयरों की संख्या तीस ही रहती है।

Sunday, 29 April, 2007

कैसा हो आपका बीमा एजेंट

पिछली बार जब मैंने एक लेख लिख कर LIC के कुछ एजेंटों द्वारा की जा रही बदमाशी के बारे में चेताया था तो वादा किया था कि आपको बताऊंगा कि किस तरह से अपना बीमा एजेंट चुनें। आज आपको इसी के बारे में बताता हूं। किसी भी नये बीमा एजेंट के साथ कोई निवेश करने से पहले उसके बारे में निम्न बातों का पता लगायें :

1. क्या आप पड़ोस में रहते हैं? : यदि आपका एजेंट आपके क्षेत्र में ही कही रहता है तो आपको उस तक पहुंचने में आसानी होगी। एक बार उसके यहां जरूर हो कर आयें। आपको उसके बारे में सूचना प्राप्त करना आसान हो जायेगा। मगर उस ध्यान रखें कि आपको जरूरत होने पर ही प्लान लें, केवल पड़ोसी को खुश करने या पड़ोसी धर्म निभाने के लिये नहीं।

2. क्या वास्तव में आप यही काम करते हैं? : हैरान न हों। आप यह सवाल जरूर करें। अधिकतर बीमा एजेंट मुख्य रूप से कोई और काम करते हैं। यह उनका पार्ट टाईम जॉब ही होता है। थोड़ा सा अतिरिक्त पैसा कमाने के लिये। याद रखें, जिस काम से उसके घर की रोटी नहीं चलती वह उसे पूरे प्रोफेशनल तरीके से नहीं कर पायेगा। उतना समय भी नहीं दे पायेगा। फुलटाईम प्रोफेशनल एजेंट से ही हमेशा डील करें।

3. कितने साल का अनुभव है?: इस काम में लोग ज्यादा देर तक नहीं टिकते। एकदम नये एजेंट जो एक साल से भी कम समय से इस प्रोफेशन में आये हों से बचें। आप उनसे उनके ग्राहकों के बारे में जानें तथा यह भी पता लगायें कि उसने कितने नये ग्राहक पिछले एक साल में बनाये। यदि वह काफी लम्बी अवधी से लगातार अच्छा काम कर रहा है तो वह इस व्यवसाय में लम्बे समय तक टिकेगा। याद रखें कि बी्मा प्लान की अवधी हमेशा बहुत लम्बी होती है। आपका एजेंट लम्बी अवधी का खिलाड़ी होना चाहिये।

4. आपके पास अपना ऑफिस है? : यदि उसके पास अपना ऑफिस तथा संपर्क के लिये लैंडलाइन नंबर है तो यह बेहतर है। हो सके तो एक बार उसके ऑफिस भी हो आयें।

5. आप किस ब्रांच के लिये काम करते हैं? : हो सके तो उसकी ब्रांच में होकर आयें तथा उसके सेल्स ऑफिसर/ डेवलपमेंट ऑफिसर से मिल कर आयें। पता करें कि कोई समस्या आने पर शिकायत कहां की जा सकती है।

6. आपने यही प्लान मेरे लिये क्यों चुना?: यह जानना बहुत जरूरी है। इस सवाल के जवाब से आप को अंदाजा हो जायेगा कि एजेंट कितना प्रोफेशनल है। ध्यान दें कि वह बीमा आपकी जरूरत के हिसाब से आपको दे रहा है या अपना कमीशन बनाने के लिये। यदि एक एजेंट एक ही योजना बता कर कहता है कि यह बहुत अच्छा प्लान है ले लीजिये तो इससे बचें। वहीं यदि एजेंट पहले आपके परिवार के बारे में सारी जानकारी लेकर आपकी आयू, आपकी भविष्य की जरूरतों तथा जिम्मेदरियों के अनुसार ही कोई प्लान का सुझाव देता है तो यह ज्यादा प्रोफेशनल रवैया होगा।

7. आपको इसमें कितना कमीशन मिलेगा? : पूछने से हिचकायें नहीं। हो सकता है कि वह छिपा जाये। यह भी हो सकता है कि फट से जवाब दे दे। इससे आपको अंदाज हो जायेगा कि वह केवल अपनी कमाई के लिये ही तो कोई प्लान आपके मत्थे नहीं मढ़ रहा।

8. प्लान का ब्रोशर कहां हैं?: "जी आज ही खत्म हो गया।" हो सकता है आपको यही जवाब मिले। ब्रोशर पूरी तरह पढ़े और समझे बिना कभी कोई प्लान न लें। यदि एजेंट आपको ब्रोशर नहीं देता तो हो सकता है वह उसमें आपसे कुछ छिपा रहा है। कंपनी की साईट पर जा कर प्लान के बारे में जानकारी हासिल करें।

(आउटलूक मनी के एक लेख पर आधारित)

Monday, 23 April, 2007

जांच प्रविष्टी

जांच प्रविष्टी

Thursday, 8 March, 2007

शेयरबाजार और बैल

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महाश्क्ति के प्रमेंद्र प्रताप सिंह ने यह सवाल मुझसे दो तीन बार पूछा था। हर बार यही सोचता कि अगले किसी लेख में इस बारे में लिखूंगा। आज फिर जब उन्हों ने यही प्रश्न उठाया तो ज्यादा इंतजार न करवाकर टाईम निकाल उनका जवाब दे रहा हूं। उनका प्रश्न था कि

शेयर बाजार और बैल मे क्‍या सम्‍बन्‍ध ? क्यों शेयर बाजार के समाचारों के साथ बैल को भी चित्रित किया जाता है।


शेयर बाजार की अपनी एक भाषा होती है। जो लोग यह सोचते हैं कि बाजार तेजी के रुख में रहेगा तो लाभ की आशा में वे और शेयर खरीदना चाहते हैं इसीलिये उन्हें तेजड़िये कहते हैं। जो सोचते हैं कि बाजार में कीमतें गिरेंगी वे शेयरों को बेचना चाहते हैं तो उन्हें कहते हैं मदड़िये। इन्ही तेजड़ियों को बाजार में बुल्स यानी बैल कहा जाता है तथा मंदड़ियों को बियर यानी भालू। इसी लिये जब भी बाजार में तेजी आती है तो अगले दिन सेंसेक्स के ग्राफ के साथ बैल को चित्रित किया जाता है और जब बाजार तेजी से गिरते हैं तो भालू का चित्र दिखाया जाता है।
मान्यता है कि यह नाम इस जानवरों के हमला करने के तरीके से पड़ा। जब भी बैल हमला करता है तो अपने शिकार को नीचे से उठा कर उछाल देता है जबकि भालू अपने शिकार को हमेशा पंजों से नीचे की ओर दबाता है।